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Neetisha Khalkho

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  • Nabbevan basantNabbevan basant

    Nabbevan basant

    नब्बेवाँ बसंत दिन महीने साल बदलते जा रहे ढर्रे ज़िंदगी के साथ में है ९० वर्ष की कन्या जाने कितने बसन्त को अपने हवाले से जिया होगा कई मुस्कुराहट कई आंसू उनके हिस्से आयी होगी पर जज़्बा जीने का कहाँ गुम कर पाई है सार्थकता जीवन में तलाशती अपनों को हमेशा याद करती चीहुँकती कभी तो कभी अट्टहास लगाती उमर और सभ्यताओं के कई पड़ाव से गुजरी मेरी यह माँ सास होकर भी अपना सासपन नहीं दिखा पाती। एहसास है उन्हें जीवन जीने के क्रम में सहना है उनको; अपने आस पास की तेज़ी से बदलती दुनिया को। सौम्य है; पर कमजोर नहीं तेज़ है; पर कर्कश नहीं प्रेम करना जानती है पर सम्मान से कोई समझौता कभी नहीं दुलार चाहती हैं; दुलार बाँटती हैं। बस कभी-कभी अपने ज़िद से दुनिया को सताती हैं । एक नन्हे की तरह उनको संभलना; एक मातृत्व को जीने जैसा है । पैरेंटिंग ऐसे मेरे हिस्से आएगी, यह नहीं सोचा था कभी पर जो हिस्से आया है वह है नयतम कई मायनों में मैंने सीखा है सब्र और धैर्य इनके साथ होके जज करने की कला सीखी है मैंने इनको शांचित पाकर इनकी खिलखिलाहट है गुंजायमान रहता है आशियाना मेरा ढूँढती है एक दूसरी धुरी को भी वह अपने पास? संगत है आस पास फिर भी एक है चुप, घुप सी अंदरूनी अनकही सी बात।। समझ पाऊँगी कितना, ख़ुद पर एतबार नहीं, पर इनकी साँसों की गति से हमारे कई रिश्तों की भी गति है। लोग सोचते हैं हम यूज़ हो रहे हम जो सीख और गढ़ पा रहे वह यह नहीं देख पाते? सबकी छल और धोखा ही लगता है कई बार?? क्योंकि उनकी मंशा में है यह सब कुछ? या मालूम नहीं हर रिश्तों को एक संस्था में तब्दील कर जो हासिल ही किया वह है कितना ही होगा सुकून से भरा? पर विस्वाश है मुझे अपनी उस ऊर्जा पर पर जो मैंने महसूस है किसी को अपने पास होकर? उस अंश को ही जी रही मैं, जुड़ा नहीं है वह अंश दोनों के हवाले से? सन्निधि में हूँ मैं उनके ही आस पास!!! लोग करते रहते हैं दूर हमे और हम हैं की आते जाते हैं पास। आपके पास एक नन्हे को पोसना और एक नन्हें के बाज़ी पीसना उस ९० साला जीव तत्व को जो है वाक़ई नहीं आसान पर हैनही इतना भी दूभर।। संवारा है यह जीवन आपकी गॉड में कभी किसी ने और आज वही जिस्म संभले है अपने उस धड़ को।। सुखद है यह अनुभव अपने हिस्से का।। जी रहे जियेंगे यूँ ही जब तक संगत अपने ही आस पास का, अपने ही अंश रूप का।। नीतिशा खलखो मैथन, १५ मार्च २०२६

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  • अकादमिक हत्या के विरुद्धअकादमिक हत्या के विरुद्ध

    अकादमिक हत्या के विरुद्ध

    अकादमिक हत्या की गूंज सहसा ; कौंधता है मेरा वह वजूद जो मैंने पाया शहर से बाहर जब निकली थी तो लगता था सहज होगा हर कुछ पर शिक्षा के मंदिर के द्वार जब राजधानी में खटखटाए तो वेलकम वार्म नहीं हुआ था चिकुटी काट जगाया गया था कि लड़की हो शरीर सहेजना होगा भाषा में इतनी मिठास और धैर्य ? यह कहाँ से पाया है, उसे भी खोना होगा? सबके प्रति संवेदना ऐसे बाँटे फिर रही जैसे हो कोई मुफ़्त की चीज़ ओह प्लीज़ अपने यूटोपिया को अपने घनेरे जंगल के संस्कारों में छोड़ आओ । यहाँ प्रतिस्पर्द्धा करनी होगी दौड़ना, हाँफना होगा बहुत। चलने होंगे कई कई चाल ‘फिटेस्ट की थ्योरी’ जो है केंद्र में ।। एक मायावी दुनिया से मेरा हुआ था पहला पहला परिचय अपने आदिवासियत पर गुमान को लोग मद्धिम मद्धिम ही सही लेकिन मुझे प्रतिक्षण बदल रहे थे। ख़्वाब था - घर से बाहर कुछ बड़ा सीखा जाएगा पर मालूम कहाँ था यह द्रोणाचार्यों की नगरी है प्रतिपल कोई ना कोई कुछ लूटकर ही जाएगा कुछ अपने भी भेष बदले आयेंगे कोई कुछ लूट रहा होगा, कोई कुछ। पर लूटेंगे सब।। कुछ को मेरी असहमतियों से दिक़्क़त है, कुछ को मेरे भोलेपन से। वह सब लूट लेना जानते हैं। मुझे भी और मेरी सामर्थ्यता को भी मेरे सपनों सहित लूटा गया।। मैं कुछ नहीं हूँ, यह मुझे बताया गया । और जो बता रहा था वह ख़ुद क्या है वह आज सब कोई बतिया रहा है।। बस कुर्सी और सत्ता के डर से कुछ निज हित में हासिल कर लेने के उद्देश्य से, वो (चापलूस) चुप्पी साधते हैं वो रीढ़ विहीन और मृत्प्राय तक हो जाते हैं । अकादमिक हत्या का सिलसिला यह नया या मात्र मेरे तक नहीं है ऐसे कई हत्याएँ मेरे पुरखा, पुरखिनों ने झेले हैं। मेरे समकालीनों ने झेले हैं और ना जाने कितनी पीढ़ियाँ इसे झेलेंगी। एकलव्य और द्रोणाचार्य की संस्कृति हर बार मिथकिय कह दोहराई जाएगी । चुप्पी और सर्वश्व देने का भाव तब भी एकलव्य के पास था और आज भी वही भाव एकलव्य ने अपनी पीढ़ियों को सुपुर्द की है ।। पर मन अब मानता नहीं उसने भूत और आज तक को तो स्वीकारा है पर घुटन, संत्राश ने बदले हैं मेरे अंदर का जैव तत्व । भावी पीढ़ियों द्वारा यह हत्याएँ अब ना होने दी जायेंगीं । वह जूझेंगी - प्रतिरोध करेंगी - प्रतिशोध भी लेंगी - पर बौजूद इसके सृजन को ही बोयेंगी ।। उन अमानवीय द्रोणाचार्यों के मन मस्तिष्क और चेतना में कुहरेंगे वो अपनी मृत्युसैया में। जब इन अकादमिक हत्याओं की चीखें इन्हें चित्कारने तक का मौक़ा नहीं देंगीं।। जलता है - धधकता है – अंदर ही अंदर वह प्रयास हत्या के मीठे ज़हरों से सराबोर होती देह पर असंख्य विषैले साँपों के झुंड में लिपटी पाती हूँ अपनी सीखने की अभिलाषा को।। दम तोड़ते , उखड़ती साँसों के बीच भी एक जिजीविषा रहती है कि अब माफ़ करने का समय चाह कर भी नहीं रह गया।। बदलना होगा ही अपने हथियार इन हत्याओं के ख़िलाफ़ - क्योंकि मेरा होना अब जज्ब करना होगा ही तुम्हें अवतार और परम ज्ञान में लिपटे तुम्हारी अर्द्ध नंगी सोच को समझ लिया है मैंने। मैं मज़बूत रही ना रही, मेरी भावी संततियाँ मेरे लेखन को औज़ार बना तुमसे जूझेंगी खेल शुरू किया तुमने था ख़त्म करना हमें है। हिंसा ; शायद तुम्हारी तरह वे नहीं करेंगी जैसा अब तक तुम करते आये हो । वह बदलेगी अपने उपक्रम - और धराशायी होगी तुम्हारी सांस्कृतिक धरोहर सर्वश्रेष्ठ होने का भाव बोध भी होगा तार-तार लो अब तुम्हें बिखरना ही पड़ेगा बार-बार हर बार।। युद्ध होंगे नहीं लहू गिरेगा नहीं पर तू अचेत बन परास्त शून्य में ताकते अपने अहम को धिक्कारते तजोगे जान । और याद रखना वह जान भी तुमसे दूरी ना बना पाएगा । वह मथेगा तुम्हारे कृत्य तुम्हारे सामने और तुम सिसकोगे उतना जितना मेरे पुरखिन और पुरखा सिसके थे।। हत्या का बोझ ना आदमी को जीने देता है ना ही मरने ।। जैसे तुमने कहा था ना - “ना उगला जा रहा है; ना ही निगला जा रहा” वही बात तुम्हें तुम्हारे अंत समय तक “ना जान छोड़ा जा रहा है ना ही जान को जिया जा रहा है।।“ वाले पायदान पर तुम्हें तुम्हारे कृत्य याद दिलवायेगी।। रघुवीर सहाय के भी ‘रामदास’ को पता था कि उसकी हत्या होगी वह उदास भी था लेकिन यहाँ की आदिवासी पात्र को पता तक ना था कि उसकी हत्या होगी ।। वह भी अकादमिक हत्या ।। इतनी तो जघन्यता से बच जाते ना तुम अकर्मणा ।।। १० सितंबर २०१५

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  • कासी के बहाने से, एक कविता...कासी के बहाने से, एक कविता...

    कासी के बहाने से, एक कविता...

    कासी है छितराया चहुँ ओरमौसम है बरसात काऔर अपनी खूबसूरती से सबको मोहताइठलाता बादलों और सूरज की गर्माहट से।सृजन में रत रहती है दुनिया,जमीन ढीली होकर धसने देती है बीजों को।जो वनस्पतियां मरणासन्न हो चुकी होती हैं,वे प्राण पाती हैं पुनः।

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  • धूसर गाजाधूसर गाजा

    धूसर गाजा

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  • इक्कीसवीं सदी सवाल पूछते हैं हमसे !इक्कीसवीं सदी सवाल पूछते हैं हमसे !

    इक्कीसवीं सदी सवाल पूछते हैं हमसे !

    चंद रोज और मेरी जां

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