इक्कीसवीं सदी सवाल पूछते हैं हमसे !

चंद रोज और मेरी जां

नफरत के बताशे जो तुमने बांटे हैं

देखना ज़द में तो वो सभी आएंगे

जिसे अपना कहा हुआ था कभी तुमने

साम्राज्य जो खड़ा किया है युद्धों के इतिहास का

भूल न पाएंगी आने वाली नस्लें तुम्हें

सुकून और सब्र से बनाया जा सकता था तरुणाई इस धरा पर

पर तुमने बाँट दिया इंसान को.

आदमियत की परिभाषा से आज जंगल के सारे जानवर डरने लगे हैं

तू तो इतराया था न अपनी बौद्धिकता पर

श्रेष्ठ जीव का तमगा लेकर नरसंहारों की जो बालियाँ चढ़ाई तूने

बाकी चर चर आज इतर रहे अपने मानव न होने पर.

क्योंकि वहाँ जघन्य रेप और गैंग रेप नहीं है,

किसी अन्य जीव जगत के प्रति ,

उसकी दैहिक भूख वा लालसा का सवाल तक नहीं है.

ममत्व इतना कि किसी के बच्चे व नन्हे शिशु तक की

 परवरिश कर पाते हैं वे(जिसे कहते हम जंगली जानवर )

और हम

हमने नन्हे क्या, मादा जात क्या?

हमने तो हर निर्बल के लिए कुछ तय कर रखा है.

अपनी हवस में इस धरती तक को बख्श नहीं रखा है.

खदान रूपी औजारों के हवाले से

 चीरा है धरती के गर्भ को बार बार.

धधकती, नाराज़ मिली भी है वह हमसे कई बार.

पर कहाँ हमें इसकी चिंता ?

हमने तो बस भोग है इसे,

रौंदा है बस इसे,

सर्व कि जगह बस स्व को जिया है हमने.

गाजा को रोता बिलखता देख भी

विश्व की सभ्यताएं अपनी रोज़मर्रा ज़िन्दगी में खुश है.

सोख लिए हैं हमारे आंसू और जज्बात

इन यूरो और दीनार, डॉलरों ने

मस्त है दुनिया अपने खून से सने हाथों के साथ भी.

कुछ तो रहम खाये हम इस धरा वासी होने के नाते भी,

जल रहा है उनका जहां

पर फ़िक्र नहीं कि कब तुम खुद भी

उसी लपट में लपेट ले लिए जाओगे.

रुको न अब

रुक भी जाओ न अब.......

(- नीतिशा खलखो, नवंबर 22, 2024)

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