कासी के बहाने से, एक कविता...

कासी है छितराया चहुँ ओर
मौसम है बरसात का
और अपनी खूबसूरती से सबको मोहता
इठलाता बादलों और सूरज की गर्माहट से।
सृजन में रत रहती है दुनिया,
जमीन ढीली होकर धसने देती है बीजों को।
जो वनस्पतियां मरणासन्न हो चुकी होती हैं,
वे प्राण पाती हैं पुनः।

हरियाली चादर ओढ़ती है,
जैसे आने वाली सर्दियों से
धरती की ऊष्मा को बचाना चाहती हो।

सृजन अनवरत चलता रहता है पूरी प्रकृति में।
कासी का आना और जाना लगा रहता है।

चिड़िया, जंतु, चर-अचर सभी गुठियाते हैं।
फंगस, बैक्टीरिया अपने संचार से
कुछ न कुछ परिवर्तित कर रहे होते हैं।

संभावनाएं तलाशी जा रही होती हैं।
जीने की सतत प्रवाह,
एक-दूसरे के साथ सहिष्णुता से जीना
पृथ्वी सीख रही होती है।

तभी कुछ भूखे (पूंजीपति दलाल) आते हैं।
प्रकृति पोस सकती है
अपने पास के संसाधनों से, पर
उनकी भूख बड़ी है।

वे सब उजाड़कर,
बिना सहभाव के
अपना चेहरा विकास (तथाकथित) नाम के साथ जोड़ते हैं।

जहां कासी नहीं बचती,
महुवा नहीं बचता,
रुगड़ा नहीं बचता,
खुखड़ी नहीं बचती।

लकड़ी वाले जंगल नहीं बचते,
सांस लेने तक के लिए प्राण वायु नहीं बचती।
नदियों में जल नहीं बचता,
मछलियां, केकड़े, जलीय जीव नहीं बचते।

आदमी नहीं बचते,
जानवर नहीं बचते।
वे भूखे खुद भी नहीं बचते, फिर भी
यह विकास का चेहरा हर किसी को सुहाता है।

सुहाने वालों की इच्छा और जिजीविषा तक नहीं बचती।
पर अर्थ फिर भी कोई समझ नहीं पाता है।

अपने होने को
तलाश नहीं पाता।
जिंदगी में जो मिला है,
उसे सब्र से भावी पीढ़ी को हैंडओवर नहीं कर पाता।

सो कासी,
उदास मत होना।

जब तक हो,
अपने सफेद फूलों को अपने सिर में बोहे,
बहना तुम हवाओं संग,
गुनगुनाना तू बारिश की बूंदों संग।

क्योंकि भूखे एक दिन नहीं होंगे।
और
तुम अपने संपूर्णता के साथ,
अपने सहजीवियों के साथ
जी उठोगी।

क्योंकि तुम सृजना हो
और
वे भूखे विध्वंसक।(नीतिशा खलखो)

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