
धूसर गाजा
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रक्त से सना देह
युद्धभूमि का नहीं
बल्कि
अस्पतालों का
मकानों का
इबादतगाहों का
स्कूल और कॉलेजों का
ऐसी है, हमारे समय की यह दुनिया।।
परमाणु, और असंख्य हथियारों से धधकने को आतुर,
धर्म और रेस को पकड़े
जाने कैसे तय कर रहे "अपना होना तक"
कल ही कोई जिंदा जला दिया गया
परसों ही लाशें नन्ही परियों और दूधमुंहे की नहीं। बल्कि दूधमुंहों की
एक वचन और बहुवचन का तो बोध याद है न !
उनके रक्तों और रूहों से
विषाक्त होती यह धरती
और
' नरपिशाच' बनती हमारी यह बेअदबी खूंखार आबादी;
रुकने का नाम ही नहीं ले रही,
ठहरने को तैयार नहीं हो पा रही।।
अपनों को तलाशने लगे हैं
जमींदोज हो चुकी शहरी आवाम वा बाशिंदगी की।
कहीं कोई हरियाली और ज़िंदगी के निशां बाकी हो जैसे।।
चिल्कारियां और रौशनाई में डूबा था कभी वह शहर
जिसे आज आसियाना तो नहीं
हां "कैंप" जरूर कहने लगे हैं
पर
उस पर भी हमले कभी भी
कहीं से भी
सांस थमी और अटकी सी हुई
मंजर जो देखे है पिछले हर एक क्षण चित्कार के , आंसुओं के ।
न पानी है, न भोजन, न हो कपड़ा कोई देह में,
है तो बस चारों ओर
बारूद, चीखें, और खूनी बंदूकें।।
रहम, दुआ, प्यार, पीड़ा
सब है जैसे गुमशुदा।
आसमान तकती रूहें
कि
कहीं से तो रहम बरसे।
उजड़, खाक बनती बेरंग धूसर गाजा की यह धरती अब अपना रंग बदले।।
जिससे बना है यह धरा
' हरा'
कतई नहीं......
लेकिन "हारा" हुआ जरूर है
इंसानियत हारी हुई जरूर है
फुहार नेह का बरसे वहां,
धनक के सात रंग रंगे एक बार फिर जीवन के सात रंग वहां ।।
नीतिशा खलखो, मैथन 22 नवंबर 2024
(गाजा मात्र की तस्वीरों को देखते हुए।)
*धनक - इंद्रधनुष
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