Nabbevan basant
नब्बेवाँ बसंत दिन महीने साल बदलते जा रहे ढर्रे ज़िंदगी के साथ में है ९० वर्ष की कन्या जाने कितने बसन्त को अपने हवाले से जिया होगा कई मुस्कुराहट कई आंसू उनके हिस्से आयी होगी पर जज़्बा जीने का कहाँ गुम कर पाई है सार्थकता जीवन में तलाशती अपनों को हमेशा याद करती चीहुँकती कभी तो कभी अट्टहास लगाती उमर और सभ्यताओं के कई पड़ाव से गुजरी मेरी यह माँ सास होकर भी अपना सासपन नहीं दिखा पाती। एहसास है उन्हें जीवन जीने के क्रम में सहना है उनको; अपने आस पास की तेज़ी से बदलती दुनिया को। सौम्य है; पर कमजोर नहीं तेज़ है; पर कर्कश नहीं प्रेम करना जानती है पर सम्मान से कोई समझौता कभी नहीं दुलार चाहती हैं; दुलार बाँटती हैं। बस कभी-कभी अपने ज़िद से दुनिया को सताती हैं । एक नन्हे की तरह उनको संभलना; एक मातृत्व को जीने जैसा है । पैरेंटिंग ऐसे मेरे हिस्से आएगी, यह नहीं सोचा था कभी पर जो हिस्से आया है वह है नयतम कई मायनों में मैंने सीखा है सब्र और धैर्य इनके साथ होके जज करने की कला सीखी है मैंने इनको शांचित पाकर इनकी खिलखिलाहट है गुंजायमान रहता है आशियाना मेरा ढूँढती है एक दूसरी धुरी को भी वह अपने पास? संगत है आस पास फिर भी एक है चुप, घुप सी अंदरूनी अनकही सी बात।। समझ पाऊँगी कितना, ख़ुद पर एतबार नहीं, पर इनकी साँसों की गति से हमारे कई रिश्तों की भी गति है। लोग सोचते हैं हम यूज़ हो रहे हम जो सीख और गढ़ पा रहे वह यह नहीं देख पाते? सबकी छल और धोखा ही लगता है कई बार?? क्योंकि उनकी मंशा में है यह सब कुछ? या मालूम नहीं हर रिश्तों को एक संस्था में तब्दील कर जो हासिल ही किया वह है कितना ही होगा सुकून से भरा? पर विस्वाश है मुझे अपनी उस ऊर्जा पर पर जो मैंने महसूस है किसी को अपने पास होकर? उस अंश को ही जी रही मैं, जुड़ा नहीं है वह अंश दोनों के हवाले से? सन्निधि में हूँ मैं उनके ही आस पास!!! लोग करते रहते हैं दूर हमे और हम हैं की आते जाते हैं पास। आपके पास एक नन्हे को पोसना और एक नन्हें के बाज़ी पीसना उस ९० साला जीव तत्व को जो है वाक़ई नहीं आसान पर हैनही इतना भी दूभर।। संवारा है यह जीवन आपकी गॉड में कभी किसी ने और आज वही जिस्म संभले है अपने उस धड़ को।। सुखद है यह अनुभव अपने हिस्से का।। जी रहे जियेंगे यूँ ही जब तक संगत अपने ही आस पास का, अपने ही अंश रूप का।। नीतिशा खलखो मैथन, १५ मार्च २०२६


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